मेरी उलझन ही सबकी उलझन
लेखक - चन्द्रशेखर साहू
चाहे अचल पहाड से निकली अविरल जल की धार जो नदी की धारा में परिवर्तित हो जाती है। चाहे सूर्य से निकली मंद सी मुस्काती आभा जो तेज चुभन सी प्रतीत होती हुई कुछ घंटों में ही शांत हो जाती है।
चाहे मां के गर्भ से जीवन के अंत तक का सफर किसी भी जीव का। जरा इन सब उदाहरणों पर गौर करें तो आसानी से समझ सकतें हैं कि काल या समय के अनुरुप सिर्फ दशाएं या उनकी परिस्थितियां बदलती है। मूल भैतिक स्वरुप तो हर अवस्था में ही अपरिवर्तित है। पहाड सेे निकला जल तो फिर जल ही है चाहे नदी में बहता हुआ समुद्र तक का सफर तय करे। सूर्य की किरण का प्रारुप भी कुछ ऐसा ही है। इसी तरह मानव भू्रण में जब चेतना तत्व की प्राप्ति होती है तो अंत तक भी वह चेतन स्वरुप में होता है। शायद मौत के बाद भी वह आत्मा जो कि एक चेतन ही है में तब्दील हो जाता है।
इन सभी का वास्तविक मूल भाव यह है कि जीवन की वास्तविक गति क्या होगी या जीवन का सफर कहां से कहां तय होगा यानि कि प्रारंभिक बिन्दु से अंतिम अिन्दु का ज्ञान सभी को है। लेकिन वास्तविकता में जो सफर तय करना है इन दोनों बिन्दुओं के बीच उसका आभास तो स्वयं को भी नहीं होता है। हां लेकिन सफर तय करने के दौरान कई ऐसे लोग मौजूद रहेंगे जो आपको सही मार्ग की ओर प्ररित करने अथवा पथभ्रष्ट करने की पुरजोर कोशिश करेंगे। आपके शुभचिंतक आपको प्रशस्ति मार्ग की ओर प्रेरित करेंगे साथ ही आपके कथित दोस्त अथवा अन्य आपको पथभ्रष्ट करने में लगे होंगे।
लेकिन वास्तविकता में इन दोनों बिन्दुओं के बीच क्या है यह जानना बेहद ही आसान हैै। इन दोनों बिन्दुओं के बीच समझौतों की झाडियां है और अपेक्षाओं की दीवारें हैै हम सदा ही दूसरो की इच्छाओं की पूर्ति करते रहतें हैंै। सेवा भाव ही जीव की यथेष्ट श्रद्धा हैै। शायद इन सभी अपेक्षाएं या महत्वकांक्षाएं ही दुखों को आमंत्रित करने की एक कला है।
लेकिन क्या समय की तरह ही दौडते इसी जीवनचक्र में क्या हम सभी महत्वकांक्षाओं को प्राप्त कर सकतें हैं क्या हम सभी की अपेक्षाओं की अग्निपरीक्षा में खरा उतर पाएंगें यह यक्ष प्रश्न विक्रम से बेताल के किए गए प्रश्नों के समान ही है। जिसका उत्तर मो शाष्द ही ढूंढ पाना असहज ही होगा। रहेंगी सदा ही दिमाग में उलझनें उलझनें और सिर्फ उलझनें



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