Story

कहानी  - बाल मजदूर  श्यामा                लेखक - चन्द्रशेखर साहू


यूँ तो रमाकांत साठे एक नामचीन व्यक्तित्व है, जो कि पूर्व ips ऑफिसर भी है | यह तो समाज सेवा का ही जज्बा था कि वो आज ऑफिसर कि नौकरी छोड़ कर समाज सेवी बन गए | उन्होंने अपना सारा समय बाल मजदूरों के कल्याण के लिए लगा दिया | वो जहा भी जाते वहीँ बड़ी बड़ी सभाएं  बाल मजदूरी के विरोध में आयोजित करते |
श्यामा जो कि एक बारह वर्षीय बाल मजदूर है |श्यामा के पिता का देहांत उस समय हो गया  था जब श्यामा कि उम्र महज वर्ष थी |श्यामा के परिवार में बची थी तो सिर्फ उसकी माँ |माँ मजदूरी करके श्यामा को अच्छे स्कूल में पढ़ने  को भेजती | यूँ कुदरत  का कहर श्यामा के परिवार से ख़त्म नहीं हुआ , उसकी माँ के दोनों पैर मजदूरी के दौरान किसी हादसे  में टूट गए |
श्यामा यूँ तो एक बुद्धिमान बालक था मगर पारिवारिक आपदा के चलते  श्यामा को स्कूल छोड़ना पड़ा | और उसे मजबूर होकर बाल मजदूर बनना पड़ा | हमेशा  फक्र  के साथ जीने  कि ही ललक थी श्यामा को  जो उसने जूता पालिश करने का पुश्तैनी धंधा शुरू किया ना कि भीख माँगना | बड़ी बड़ी होटलों के पास श्यामा दिनभर जूते पालिश करता और शाम को जो भी उसे रुपये मिलते वो घर पर रुपये लेकर चला जाता और अपनी माँ को दिन भर के किस्से सुनाता |
एक दिन श्यामा किसी सभा के पास जूता पालिश करने के लिए बैठा था | उसी दौरान रमाकांत साठे उस सभा को सम्बोधित करने के लिए चमचमाती कार से वह पहुच चुके थे | साठे ने बाल मजदूरों के खात्मे कि बात कह रहे थे और साथ में बाल मजदूरों को मुफ्त शिक्षा कि बात भी |
श्यामा को यह सब सुनकर  लगा कि जैसे कि भगवान् ने एक हमदर्द मसीहा भेजा हो | आज श्यामा के सोये हुए स्वप्न फिर जाग गए थे | साठे साब ने बाल मजदूरों के लिए मुफ्त शिक्षा कि घोषणा कि और साथ में बाल मजदूर के परिवार को  पैंशन की भी घोषणा हुई | बड़े बड़े घरानों से आये उद्योगपतियों ने योजना की सफलता के लिए हज़ारों लाखों रुपये दान भी किये |
और रुपियों से भरा झोला लेकर साठे साब चमचमाती कार में सवार होकर चले गए और योजना का काम कुछ नुमाइंदों   को सौंप  गए | साठे साब के नुमाइंदों   ने शहर से बाल मजदूर चुने जिनमे श्यामा भी शामिल था | अब श्यामा का दाखिला शहर के नामी स्कूल में  छठी कक्षा में हो गया था और उसकी माँ को 500 रुपये महीने की पैंशन भी मिल रही थी |
श्यामा के जीवन  में परिवर्तन सा गया | वो खूब मन लगा कर पढ़ने लगा और पूरे स्कूल में वो प्रथम रहा | आज श्यामा के सपनों में पंख लग चुके थे | श्यामा का एक ही लक्ष्य था वो यह की वो भी बड़ा होकर साठे साब की तरह एक ऑफिसर बनेगा, एक सच्चा ऑफिसर |
कब  यूँ दो साल गुजर गए श्यामा को पता ना चला | आज श्यामा को स्कूल में स्कूल टॉप करने की  बधाइयां बच्चों और स्टाफ द्वारा दी जा रही थी | घर आकर माँ ने श्यामा का रिजल्ट देखा तो ख़ुशी से आंसू निकल आये | क्यूंकि वो अपने लाडले के ऑफिसर बनने के स्वप्न को सच होता देख रही थी |
श्यामा को साठे साब के नुमाइंदे ने बुलाया और कहा की श्यामा तुम्हारी उम्र अब 14 वर्ष हो गई है अब हमारी संस्था तुम्हारा खर्च नहीं उठा सकती क्यूंकि हम सिर्फ बाल मजदूरों की ही शिक्षा की व्यवस्था करते है |

वो दिन किसी आपदा से कम नहीं था श्यामा के लिए | वो अपनी आँखों से ऑफिसर बनने के स्वप्न को फिर टूटता देख रहा था लेकिन श्यामा उतना ही दृढ बालक था | अगले दिन वातावरण  में एक आत्मविश्वास से  लबरेज गूँज सुनाई दे रही थी - साब जूते पालिश करवा लो...... जूते पालिश करवा लो......

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