Wednesday, 19 February 2014


**शीर्षक - " प्रियतमा "  कवि - चन्द्र शेखर साहू ****






फेसबुक पर प्रियतमा तुम्हारे
नखराले अंदाज़ नज़र जब आते हैं
सुंदर सुंदर कपोल देखकर
गर्म साँसों के फव्वारे फूट आते हैं |

किसी ज़माने में कॉलेज कि सीढ़ी पर
इंतज़ार  तेरा हम करते थे |
बस इक झ़लक मिल जाये तेरी
गुज़ारिश यह ही एक रखते थे |

किसी बहाने हम फ़ोन पर
बाते तो  तुझसे करते थे |
मगर इज़हार प्यार का करने से
मन ही मन बड़े डरते थे ||

दिल मेरा यह कहता आज भी
मुहब्बत तो तुम मुझसे करती थी |
सोंचकर थोड़ी सी लोकलाज
इज़हार ए इश्क़ से डरती थी ||

तेरी सुंदर मुस्कान देखकर
घंटों भी कुछ पल लगते थे |
ओझल है जो अब मुस्कान तुम्हारी
तब दिन दुने रात चौगुने लगते हैं ||

तेरी होठों कि सुर्ख़ियों से,
यार लफ्ज़ बड़े जमते थे |
आज उन लफ्ज़ो को सुनने
कान हमारे तरसते हैं ||

देर नहीं हुई है अभी प्रियतमा
आओ नवजीवन कि शुरुआत करे |
सूखे से इस जीवन को

मिलकर फिर आबाद करे ||

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