**शीर्षक
- " प्रियतमा " कवि - चन्द्र शेखर
साहू ****
फेसबुक पर प्रियतमा तुम्हारे
नखराले अंदाज़ नज़र जब आते हैं
सुंदर सुंदर कपोल देखकर
गर्म साँसों के फव्वारे फूट आते हैं |
किसी ज़माने में कॉलेज कि सीढ़ी पर
इंतज़ार तेरा हम करते थे
|
बस इक झ़लक मिल जाये तेरी
गुज़ारिश यह ही एक रखते थे |
किसी बहाने हम फ़ोन पर
बाते तो तुझसे करते थे
|
मगर इज़हार प्यार का करने से
मन ही मन बड़े डरते थे ||
दिल मेरा यह कहता आज भी
मुहब्बत तो तुम मुझसे करती थी |
सोंचकर थोड़ी सी लोकलाज
इज़हार ए इश्क़ से डरती थी ||
तेरी सुंदर मुस्कान देखकर
घंटों भी कुछ पल लगते थे |
ओझल है जो अब मुस्कान तुम्हारी
तब दिन दुने रात चौगुने लगते हैं ||
तेरी होठों कि सुर्ख़ियों से,
यार लफ्ज़ बड़े जमते थे |
आज उन लफ्ज़ो को सुनने
कान हमारे तरसते हैं ||
देर नहीं हुई है अभी प्रियतमा
आओ नवजीवन कि शुरुआत करे |
सूखे से इस जीवन को
मिलकर फिर आबाद करे ||

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