** हास्य कविता शीर्षक#५- "टिकट" कवि - चन्द्र शेखर साहू **
टिकट के लिए बिल्कुल मुस्तैदी से डटा हुआ हूँ
जी हाँ हुज़ूर में लाइन में लगा हुआ हूँ ||
हसीं जीवन में सफ़र कहाँ ख़त्म होते हैं,
कई मर्तबा बेग खाली तो बेग जमा लिए होते हैं|
हर सफ़र को शुरू रेलवे स्टेशन से करना होता है ,
नहीं है बाप कि रेलगाड़ी,टिकट कटना तो पड़ता है|
रेलवे टिकट के लिए बिल्कुल मुस्तैदी से डटा हुआ हूँ,
जी हाँ हुज़ूर में लाइन में लगा हुआ हूँ ||
आखिर कैसे ठुकरा दूं में उनकी पेशकश ,
जब दिलदार को मूवी दिखने कि बारी आती है |
मूवी टिकट से दुगने दामों कि तो वह,
चाऊमीन
,बर्गर, आइसक्रीम चट कर जाती है |
बेपरवाह
खर्चे की मूवी टिकट के लिए बिल्कुल मुस्तैदी से डटा हुआ हूँ,
जी हाँ हुज़ूर में लाइन में लगा हुआ हूँ ||
जिंदगी
में हर वक़्त कहाँ अच्छा रह पाता है,
बुरे वक़्त में ज़रूर अस्पताल दाखिल होना पड़ता है |
डॉक्टर
को चढ़ावा चढाने से पहले भी ,
भर्ती काउंटर से पर्चे कटवाना पड़ता है|,
मरीज़ टिकट के लिए बिल्कुल मुस्तैदी से डटा हुआ हूँ
जी हाँ हुज़ूर में लाइन में लगा हुआ हूँ ||
हर शुभकाम से पहले भगवान की जरुरत होती है
दर्शन हरी के करने को उपस्थिति हमारी मंदिर में होती है
लग सामान्य लाइन में दर्शन कहा हो पाते हैं ?
कटवा वीआईपी टिकट दर्शन जल्दी
कर पाते हैं
वीआईपी टिकट के लिए बिल्कुल मुस्तैदी से डटा हुआ हूँ
जी हाँ हुज़ूर में लाइन में लगा हुआ हूँ ||
Awesome poem !!
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